सोलह दिसंबर: मैं हूं निर्भया - तड़पती रूह बिलखती आत्मा


written by Shreya at in category Social with 0 Comments


16 दिसम्बर 2012 की उस घटना के बाद आप लोगों ने मुझे यह नाम निर्भया दिया था। याद है न? कैसे भूलेंगे आप । आपके घर के आंगन में भी निर्भया खेल रही होगी। उसे देखकर, आज के दिन आपको सहसा हि हमारी याद आती होगी।  मेरे भी मां-बाप थे, परिवार था, घर था, समाज था, अरमान थे, ख्वाहिशें थी, कुछ करने की चाह थी मैं भी आगे बढ़ रही थी लेकिन एक मोड़ पर आकर ऐसी फंसी कि आपके समाज की कुछ दरिंदों ने मुझे अपनी हैवानियत का शिकार बना लिया। मसला कुचला रौंदा वह सब किया जो कभी आप अपने परिवार की किसी बेटी के साथ होने की कल्पना भी नहीं कर सकते। मेरी आत्मा आज तक तड़प रही है। लेकिन आपका समाज  उन दोषियों को, जिन्होंने मेरी दुनिया खत्म कर दी, उन्हें जेल में बैठा कर मटन खिला रहा है। आज तक में न्याय के लिए तड़प रही हूं यह मेरी अकेले की कहानी नहीं है,  मेरे बाद तो  ना जाने कितने लोगों के साथ यह कहानी दोहाई जा रही है। लेकिन आप सभी लोग इसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठा पा रहे।

अगर आपकी मानवीयता आपको झकझोरती होगी तो  निर्भया का दर्द ताजा हो जाता होगा।  उसकी असहनीय पीड़ा एक बार फिर मन को रौंदती होगी। वह तमाम सवाल फिर   मस्तिष्क में अपनी परिक्रमा शुरू कर देते होंगे: शहर भर में वह बस कैसे घूमती रही? रात को हर चौराहे पर जिन पुलिस वालों को पहरे पर होना चाहिए था, वे कहां थे? दर्द से कराह रही निर्भया सड़क के किनारे पड़ी रही, पर उसे किसी ने अस्पताल क्यों नहीं पहुंचाया ?

देश की राजधानी में आज ही के दिन निर्भया कुछ दरिंदों की हैवानियत का शिकार हुई थी। पूरे सात साल बीतने के बाद भी इन दरिंदों में से चार को सुनाई गई सजा नहीं दी जा सकी है। कहने को बेटियों को तत्काल न्याय दिलाने के लिए सख्त कानून भी बन गया लेकिन देशभर की निर्भयाओं को न्याय मिल पाना आज भी असंभव कार्य जैसा बना हुआ है। अधिकतर पीड़िताओं की चीखें तो थानों की देहरी पर ही दम तोड़ देती हैं। अदालत तक पहुंची लड़ाई भी कानूनी दांव-पेचों में उलझकर लंबे संघर्ष में बदल जाती है। 

मेरे साथ हुई दरिंदगी की कहान मैं निर्भया आज आपको फिर सुनाती हूँ...

हैवानियत की पराकाष्ठा ने मेरा जीवन छीन लिया में भी जीना चाहती थी...इंसाफ के इंतजार में बिलख रही है मेरी रूह

यूपी के एक गांव से अपने सपनों और मम्मी-पापा की उम्मीदों को पूरा करने के लिए मैं 23 साल की उम्र में देश की राजधानी दिल्ली आई थी। पैरामेडिकल में दाखिला लिया। मन में जीवन की जंग जीतने को हर तकलीफ पार करने का जज्बा था। पर मैं हार गई। हारी भी तो किससे... जिंदगी से नहीं, बल्कि हैवानियत से। चलती बस में जघन्य बलात्कार की शिकार हुई। ऐसी क्रूरता कि मेरी आंतें तक बाहर आ गईं। ऐसे जख्म मिले कि मेरी रूह तक से भी खून की बूंदें टपकती हैं।

पहले दरिंदों, फिर व्यवस्था की हुई शिकार...
....और जैसे यह काफी नहीं था तो मुझे न्याय दिलाने को लड़ रहे मेरे मां-पापा अब न्यायिक और कानूनी पेचीदगियों की हैवानियत के शिकार बन रहे हैं।

कौन हूं मैं, क्या आपको याद है...
भले ही मैं अब आप लोगों के बीच नहीं, लेकिन आज भी रोज अन्याय का जहर पी रही हूं। अरे, आप लोग तो मुझे भूल गए होंगे। मैं निर्भया हूं। आप ही लोगों ने तो मुझे यह नाम दिया था। वही निर्भया जिसके साथ छह लोगों ने 16 दिसंबर 2012, रविवार की रात चलती बस में हैवानियत की थी। 

आंखों से आंसू गिर रहे हैं। गला भरा है। आवाज नहीं निकल रही। फिर भी मैं आपके लिए उस भयावह काली रात को दोहराती हूं। दोस्त के साथ उस रात फिल्म देखने के बाद मुनिरका से द्वारका जाने वाली बस में बैठी थी। बस में हम दोनों के अलावा छह लोग थे। कुछ समझ पाती इससे पहले ही सभी ने मेरे साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी। दोस्त ने बीच-बचाव किया तो उसे बुरी तरह पीटकर बेहोश कर दिया।

ऐसे ही होते होंगे हैवान...
मैं चीखती रही। चिल्लाती रही। बहुत हाथ-पैर जोड़े पर दरिंदों को मुझपर रहम नहीं आया। सभी ने मेरे साथ वो सब कुछ किया जो एक जल्लाद या कसाई भी किसी के साथ करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। पीटा-बलात्कार किया, शरीर में लोहे का सरिया घुसा दिया। फिर, मरा हुआ जानकार निर्वस्त्र ही चलती बस से बाहर फेंक दिया। उन जख्मों के आंसू मेरी आंखों से आज भी गिरते हैं, रूह उस खौफनाक रात को याद कर आज भी तड़पती है।

फिर मैं बेटी से एक मुद्दा बन गई...
पुलिस ने मुझे सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया। डॉक्टरों ने पांच बार ऑपरेशन किया। आंत का अधिकतर हिस्सा बाहर निकाल दिया। जख्म इतने गहरे थे कि मेरी हालत बिगड़ती चली गई। 26 दिसंबर को सरकार ने मुझे इलाज के लिए सिंगापुर भेज दिया। सबको पता था मैं बच नहीं सकती। मैं सभी के लिए मुद्दा बन गई थी।

सब अपनी साख बचाने में लगे थे। आखिरकार वही हुआ जो सब जानते थे। मैं बच नहीं सकी। 29 दिसंबर की रात करीब सवा दो बजे मैंने सिंगापुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया। फिर मुझे गम और गुस्से के साथ पंचतत्त्व में विलीन कर दिया गया।

कानून ने मेरे दोषियों को बचा लिया...
मेरे साथ हुई हैवानियत पर पूरे देश में गुस्सा था। सब ‘तत्काल न्याय और सजा’ देने की मांग कर रहे थे, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। क्यों... क्योंकि कानून की किताबों में इसका प्रावधान ही नहीं था। घटना के कुछ दिन बाद पुलिस ने सभी छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। एक (राम सिंह) ने तो जेल में आत्महत्या कर ली।

एक नाबालिग होने के आधार पर बच गया। और आज 7 साल बाद भी मुझे मौत की नींद सुलाने वाले बाकी चार दरिंदे अब भी तिहाड़ में मटन खा रहे हैं। और यहां न्याय के इंतजार में मेरी आत्मा अब भी बिलख रही है।

लेकिन पिछले वर्षों से अबकी साल कुछ भिन्न गुजरा। 16 दिसंबर आते-आते, देश के कोने कोने में, एक के बाद एक निर्भया, कहीं हैदराबाद में तो कहीं उन्नाव में तो कहीं रांची में तो कहीं मुजफ्फरपुर में, देश के न जाने कितने हिस्सों में, कहीं जलती, कहीं जलाई हुई, कहीं बालिग तो कहीं बच्ची, कहीं बूढ़ी तो कहीं कमसिन, कई-कई रूपों में दिखने लगीं। हर रूप भयानक व जघन्य अपराध का परिणाम। जो गुस्सा और आक्रोश 16 दिसंबर को फूटा था, वह कई दिनों तक रोज फूटता रहा। अचानक हैदराबाद में गिरफ्तार बलात्कार और जघन्य हत्या के चार आरोपी मार गिराए गए। पुलिस के अनुसार उन्होंने पुलिस की रिवाल्वर और बंदूकें छीन लीं। उनसे पुलिस पर गोलियां चलाई और पुलिस ने अपने बचाव में उन्हें मार गिराया।
इस अटपटी कहानी ने लाखों लोगों के दिलों में घर कर लिया। चार दिन पहले जिस पुलिस को हैदराबाद की आक्रोशित भीड़ पीड़िता की मौत का जिम्मेदार ठहरा रही थी, उसी पुलिस पर फूल बरसाए। पूरे विश्वास के साथ कहा गया कि पुलिस ने जो किया उससे डर पैदा होगा, कोई अब ऐसा काम करने की हिम्मत नहीं करेगा। लेकिन, दूसरे ही दिन आठ दिसंबर की रात ओडिशा के संबलपुर जिले में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना घटी। जुर्म करने वालों की हिम्मत को कम आंका जाने का सुबूत बहुत ही जल्दी प्राप्त हो गया। गोलियों की ठांय-ठांय से संतुष्ट होना न तार्किक है, न न्यायसंगत और न ही समस्या का हल है। पिछले दो वर्षों में, उत्तर प्रदेश में अपराध पर रोक लगाने के लिए योगी जी ने पुलिस को मुठभेड़ करने की छूट दे दी है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने 5,178 एनकाउंटर किए हैं, 1,859 लोगों को घायल किया है और 103 लोगों को मार डाला है। एक को छोड़कर, सब गरीब, अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलित। ऐसे लोग, जिनकी ओर से बोलने वाले संख्या में कम और प्रभाव में नगण्य होते हैं। उनमें से कितने दोषी थे और कितने निर्दोष, इसका पता तो कभी चल ही नहीं पाएगा। पुलिस ने उन्नाव में जलाई गई महिला और उन्नाव की उस नाबालिग पीड़िता की एफआईआर क्यों नहीं लिखी थी? नामी-गिरामी बलात्कारियों को शासक दल के नेताओं का संरक्षण क्यों प्राप्त होता है? मुजफ्फरनगर के तमाम बलात्कार के मामलों को न्यायालयों से वापस क्यों लिया गया? चिन्मयानंद के खिलाफ 2008 से चल रहा यौन शोषण का मुकदमा भी वापस लेने की कोशिश क्यों की गई?

और भी बहुत सारे सवाल हैं। पीड़ितों की सुरक्षा का इंतजाम क्यों नहीं किया जाता? गरीब, पीड़ित परिवारों को मुकदमा लड़ने कि सहायता सरकार क्यों नहीं देती? सवा लाख से अधिक मामले लंबित क्यों हैं?

Every day, Every month, Every year- the same story, the same drama unfolds. Its the question we ask every day to everyone. We get the same answers. When are we going to get tired of these incidents and the same assertion that we get every time something so heinous happens. I say don't wait, stand up and fight, it's your war, against your self-respect, they all will keep fighting and they all will keep targeting. Until, unless we raise our voice nothing can be changed in this world.

 

BE THE CHANGE TO SEE THE CHANGE

 

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